#Shayari

बुलंदी पे निगाहें, कदमों में समाज रखते हैं,

लबो को खामोश, अल्फाज़ो में आवाज़ रखते हैं

कलंदर की फितरत, हुनर सिकंदर का रखते हैं,

तुम कुएं के शाह हो, हम हिसाब समंदर का रखते हैं

कभी बेगानों, कभी अपनों, कभी खुद का डर रखते हैं,

कैसे लोग हैं जो हर चौखट पे अपना सर रखते हैं

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