ना भगत आएंगे ना आजाद आएंगे

ना भगत आएंगे ना आजाद आएंगे।
मेरे आज से तुम्हारे कल आएंगे।।

कैसे हां में हां मिला दूं हर बात पे।
मेरी ना से ही विचारों में अंतर आएंगे।।

ख्वाहिशें मुकद्दर पर छोड़ भी दें लेकिन,
जो बो रहे हैं हम, हिस्से में वही फल आएंगे।

पहले तुम्हे मिले या मुझ तक आ जाए।
सबके ही सामने ये मंज़र आएंगे।।

रहते हैं फ़िराक़ में की इश्क़ की बात हो।
मुल्क के मसले भी किसी पहर आएंगे।।

सियासतदार तो करते हैं अपनी सहूलियत से।
अमन की बातो में भी अब ज़हर आएंगे।।

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