सुबह से शाम तक किसी भी चैनल पर या किसी भी अखबार में, अहम खबर यही है की मंदिर बनेगा। इससे भी ज्यादा जरुरी ये हो गया है सभी के लिए की कब बनेगा, कैसे बनेगा, कौन बनवाएगा, कौन क्या कह रहा है, क्यों कह रहा है और चुप भी है तो क्यों चुप है।
राजीनति की यही तो ख़ूबसूरती है कोई कुछ करता भी नहीं है और सब कुछ होता भी रहता है और सब कुछ हो भी जाता है और कोई कुछ करता ही नहीं है। ये अचानक मंदिर इतना बड़ा मुद्दा हो गया, इतनी बड़ी जरुरत हो गयी करोड़ो हिन्दुओं की, के इसके आगे हम मूल-भूत आवश्यकताओं को भी भूलने लगे। हमने किसी से नहीं पूछा की अस्पतालों में लोग सुविधाओं की कमी से क्यों मर रहे हैं, या बेरोजगारी बढ़ने का असल कारण ये जो हमारी दम तोड़ती शिक्षा व्यवस्था है, उसके लिए हम क्या कर रह हैं। अब मंदिर तो जरुरी हो ही गया है, हर किसी को मंदिर जाना पड़ेगा, भगवान् से ही उम्मीद करनी पड़ेगी, चाहे बीमार हो या बेरोजगार या फिर सुस्त प्रशासन से त्रस्त।
हर किसी को मंदिर जाना चाहिए, क्योकि शायद वही आपकी कोई सुनेगा। ये बात सरकार को भी समझ आती है, इसलिए और कुछ मुद्दा बने या किसी और को मुद्दा बनने ही ना दिया जाए पर मंदिर जरूर बनना चाहिए। नहीं तो किसान अपनी बदहाली को ले कर किसके पास जाएगा। लाखो बेरोजगार कहा जाएंगे नौकरी मांगने। मंदिर कम होंगे तो भीड़ बढ़ेगी, लोगो को असुविधा होगी, इसलिए हर गली में एक मंदिर होना चाहिए। सबका एक अलग मंदिर जहा वो सुबह से शाम तक मांगता रहे। अपना हक़ भी मांगता रहे। ये कैसा मायाजाल है जो न दिखता है न ही समझ आता है, बस सबको अपने अंदर फसाये हुए है। गरीब मंदिर मांगेगा ही क्युकी सरकार वही दे सकती है और नहीं भी दे पाएगी तो इसके नाम पे वोट तो हर बार ले ही लेगी।
ये मंदिर सिर्फ आस्था का प्रश्न नहीं है अगर होता तो हल हो भी गया होता। ये तो वो बाजार है राजनीती का जहा वोटों का कारोबार इतनी सरलता से हो जाता है की पता ही नहीं चलता कब सालो बीत जाते हैं और हम पूछना ही भूल जाते हैं की नौकरिया जो मिलने वाली थी वो कहा हैं या अस्पताल में ऑक्सीजन क्यों नहीं है। विद्यालयों में शिक्षक क्यों नहीं हैं और ये सडको को सावन का इंतज़ार क्यों रहता है, क्यों ये पहली बरसात के बाद ही अपना वज़ूद तलाशने लगती हैं। रामराज होगा तो सवाल भी श्री राम से ही पूछा जाएगा। अब वो न तो न विधान सभा में मिलेंगे न लोक सभा में, उनके लिए तो मंदिर चाहिए, वो भी वही जहा इतना विवाद है। आखिर यही तो रामराज है।
मंदिर जरूर बनाइये और जल्दी बनाइये, सरकार तो ५ साल में बदल सकती है, श्री राम तो वहीं रहेंगे, फिर जवाबदेह भी वही होंगे ५ सालो के, विकास के नाम पे किये हुए वादों के, हर उस जुमले के जिसपे तालिया बजती हैं और फिर सब भूल जाते हैं। और फिर जो काले धन के १५ लाख आने थे उसका भी तो तगादा करना है मुझे, पहले जो थे वो बहुत काम बोलते थे, अब जो साहब हैं वो सुनते ही नहीं हैं, तो मुझे भी मंदिर ही जाना पड़ेगा।
पूरा पढ़ने का शुक्रिया और बात केवल पढ़ने की नहीं है, सोचियेगा की आपकी जरुरत क्या है, और सरकार की जिम्मेदारी भी और क्या वो इस जिम्मेदारी को निभा रही है।