अगर मैं प्रधानमंत्री होता।

अगर मैं प्रधानमंत्री होता।

स्कूल में ये निबंध सभी ने लिखा ही होगा और यदि नहीं तो अब भी लिख के देख सकते हैं। ज्यादा नहीं २०० शब्दों में भी आप खुद को भारत का प्रधान मंत्री मान सकते हैं, वैसे ये निबंध स्कूलों में ही लिखवाया जाता है, उच्च शिखा के दौरान नहीं क्यूकि तब तक सभी को राजनीति की समझ हो चुकी होती है किन्तु देश का प्रधानमंत्री होने के लिए राजनीति के साथ नीयत भी चाहिए होती है वो शायद उस बच्चे में ही हो सकती है जो स्कूल में ये निबंध लिखता है, जिसमे वो गरीबी मिटाने, सबको रोजगार देने की बात करता है, जिसमे वो धर्म की नहीं सद्भाव की बात करता है, एकता की बात करता है। जिसे लिखते समय उसे अहसास होता है की ये कितनी जिम्मेदारी का काम है और कितना जरुरी भी, और तब शास्त्री और नेहरू के ही उदहारण लिखे जाते हैं। मैंने भी अपने निबंध में शास्त्री जी का उल्लेख किया था जिनके बारे में तब पढ़ा था और उनका चरित्र इतना प्रभावशाली था की मैं खुद को या अपने हर आपने वाले प्रधानमंत्री को वैसा ही देखना चाहता था।
उन्होंने भी पंजाब नेशनल बैंक से लोन लिया था और प्रधानमंत्री होते हुए भी चुकाया, उन्होंने नए कुर्ता ये कहते हुए नहीं लिया की वे एक गरीब देख के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने युद्ध के दौरान खुद भी उपवास रखा और देश से भी उपवास का आग्रह किया जिससे की सेना की मदद हो सके।
वैसे मैं ये इसीलिए याद दिला रहा हूँ की जो निबंध आपने लिखा होगा, अगर नहीं भी याद है तो गूगल कर के देख लीजिये और फिर खुद से पूछिए की क्या आपके प्रधानमंत्री वैसे ही हैं, यदि हैं तो अच्छा है की आप प्रधानमंत्री नहीं है पर अगर ऐसा नहीं है तो क्या आप उनसे और उनकी कार्य शैली से संतुष्ट हैं। यदि नहीं हैं तो आप सवाल क्यों नहीं कर रहे हैं।
क्या हमने अपने समाज को वैसा बनाया या बनाने की कोशिश कर रहे हैं जैसा हम उस निबंध में लिखते हैं। और क्या उस निबंध में हम अपनी जिस सोच को व्यक्त करते हैं वो हमारी नहीं है या उसे अमल में लाने के लिए प्रधानमंत्री ही होना पड़ता है।

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